Thursday, December 14, 2017

समापक शब्द : कार्ल वेनबेरी

कार्ल वेनबेरी की एक कविता
(अनुवाद: अनुपमा पाठक)

अन्ततः यही तो है प्रेम:
एक असाध्य रोग
जो कम से कमतर बर्दाश्त हो पाए छू दिए जाने पर;
फिर भी एक भ्रम
जो पलक झपकते ही अन्ततः खुद को खुद से ही दूर कर देता है
इससे पहले की हम मुख मोड़ पायें
रिक्त दीवार के विरुद्ध.
शायद हमारे पास आता है, आस की विडम्बना को रेखांकित करने,
एक पत्र में मात्र एक शब्द के रूप में हमारी मृत्यु के ठीक एक दिन पश्चात.

Slutord

Sådan är till slut kärleken:
ett oläkligt sår
som mindre och mindre tål att röras vid;
men ändå en hägring
som blicken sist av allt sliter sig loss ifrån
innan vi vänder ansiktet
mot den tomma väggen.
Kanske når oss, tillägger det ironiska hoppet,
ett ord i ett brev dagen efter vår död.

--Karl Vennberg

Wednesday, December 13, 2017

मैं किसी के लिए नहीं लिखता : विल्हेम इकेलुन्द

विल्हेम इकेलुन्द की एक कविता 
(अनुवाद : अनुपमा पाठक) 

मैं किसी के लिए नहीं लिखता --
हवाएँ जो यहाँ-वहाँ भटकती हैं उनके लिए,
बारिश जो रोती है उसके लिए,
मेरे गीत आँधी की तरह हैं,
जो बड़बड़ाते हुए चल देते हैं
शरत्काल के अँधेरे में
और बात करते हैं धरा से
रात से और बारिश से.


Jag diktar för ingen

Jag diktar för ingen --
för vinden som vandrar,
för regnet som gråter,
min sång är som blåsten,
min sång som mumlar och går
i höstnattens mörker
och talar med jorden
och natten och regnet.

--Vilhelm Ekelund

Tuesday, October 10, 2017

जीवन के बारे में : मायिकेन योहानसन


मायिकेन योहानसन  की  एक कविता
(अनुवाद : अनुपमा पाठक )

परपीड़क करते हैं इंतज़ार
लेकिन
भयभीत लोग कहते है...
मैं नहीं मर सकता, मैं मरना नहीं चाहता !

और वह सोचता है, चमत्कृत होता है:
मृत्यु यूँ होनी चाहिए
कि मृत्यु स्वयं मृत्य को प्राप्त हो जाए...

और वह कहता है :
मैंने एक शहर के बारे में सुन रखा है
बादलों के पार है वह शहर
हालाँकि अब तो वह कहलाता है
नगर पालिका
बादलों के ऊपर स्थित...
सोचता है वह --कि, क्या वो शहर सच में होगा मौजूद
जब मैं मृत्य को ही मार डालूँगा?

Om livet

"Träfracken väntar"
Men
säger den ängslige -
jag vill inte dö!

Och han undrar:
Döden måste vara att
döden dö...

Och han säger:
Jag har hört om en stad
ovan molnen
fast nu heter det
en kommun
ovan molnen...
Undrar om den finns
när jag ska döden dö?

--Majken Johansson

Saturday, July 1, 2017

प्रकाशमय ग्रीष्म : वेरनेर वोन हेदेंस्तम

वेरनेर वोन हेदेंस्तम की एक कविता 
(अनुवाद :अनुपमा पाठक) 

हे अनुपम ग्रीष्म !
तुम अपनी रौशनी से मुझे सराबोर कर देते हो
मुलायम से पथ पर चलता हूँ मैं
जंगली गुलाबों की भीड़ के बीच तुम मेरा एक ठौर कर देते हो

यहाँ चमकती हुई झील तीव्रता से
शाखाओं को प्रतिविम्बित करती हुई कहीं गहरे उतरती है
और बकरियां ऊँची चट्टानों पर
चुपचाप अँधेरे में विचरती हैं

हर एक कोना हर एक झाड़ी दिव्य प्रकाशित
ये सज्जा तो तुम्हारी पहचान है न ग्रीष्म
तुम से ही मैं आया हूँ, तुम तक ही मुझे जाना है
तुम्हारे दिए हुए खुशियों के पंख से ही, हे ग्रीष्म !



Sommarljuset


Du underbara sommardag,
som med ditt ljus mig fyller!
Den mjuka stigen vandrar jag
bland vilda rosors myller.

Här glimmar sjön i branta djup
och speglar häll och grenar,
och getter högt på bergets stup
gå tyst bland mörka enar.

Bestråla, ljus, de minsta snår,
som dina marker smycka!
Från dig jag kom, mot dig jag går,
bevingad av din lycka.

--Verner von Heidenstam