Saturday, June 23, 2012

हृदय और मस्तिष्क: एल्सा ग्रावे

एल्सा ग्रावे की एक कविता
(अनुवाद: अनुपमा पाठक)


हृदय और मस्तिष्क
वे इतने करीब रहते हैं संग,
सामान्य तौर पर एक ही किराये के मकान में.
कभी कभी घरों में
जहाँ हो उद्यान
और ग्रीष्म गृह एवं हरित गृह
और कलात्मक जालीयुक्त फाटक.
वे इतने करीब रहते हैं संग,
निकटतम पड़ोसी हैं वे.
लेकिन ऊँचा है उनके बीच का फाटक
और झाड़ियाँ है बिन कटी हुईं
और कांटेदार -
और पड़ोसियों में नहीं है कोई मेल-जोल,
उनका एक दूसरे के साथ तो बिलकुल नहीं.
कभी कभी - पतझड़ में
हृदय के उद्यान से गिरते हैं पत्ते
मस्तिष्क की सोच में.

कई लाली लिए हुए पत्ते
और सुनहरे
गिरते हैं और फंस जाते हैं नागफनी की झाड़ियों में.
जब आता है तूफ़ान
तब उठा ली जाती है पड़ोसी के घर की छत!

Hjärna och hjärta

Hjärna och hjärta
de bo så nära varandra,
oftast i samma hyreskasern.
Ibland i villor
med trädgård
och lusthus och växthus
och grindar med konstrikt galler.
De bo så nära varandra,
är närmaste grannar.
Men grinden är hög
och häcken oklippt
och törnig -
och grannarna umgås inte,
inte alls med varandra.
Ibland - om hösten
faller löv från hjärtats trädgård
ner i tankens.

Många röda löv
och gyllengula
faller ner och fastnar i hagtornshäcken.
När stormarna kommer
då lyftes taket på grannens villa!

-Elsa Grave

4 comments:

  1. दिल और दिमाग का पड़ोस, अच्छी कविता...

    ReplyDelete
  2. कई लाली लिए हुए पत्ते
    और सुनहरे
    गिरते हैं और फंस जाते हैं नागफनी की झाड़ियों में.
    जब आता है तूफ़ान
    तब उठा ली जाती है पड़ोसी के घर की छत!

    बहुत ही बढ़िया।

    सादर

    ReplyDelete
  3. कल 24/06/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. बहूत सुंदर रचना...
    :-)

    ReplyDelete