Tuesday, July 3, 2012

आँसू: एल्सा ग्रावे

एल्सा ग्रावे की एक और कविता
(अनुवाद: अनुपमा पाठक)

 
मेरे आँसू
नहीं बुझाते कोई आग,
और मेरी आग
नहीं
सुखाती कोई आँसू.

कभी नहीं सूखते मेरे आँसू,
वे बहते हैं,
वे बहते ही जाते हैं,
नहरों, नदियों और महासागरों तक,
और तब भी होते हैं
बेहतर नहीं.
फिर भी मैं एक साथ रो सकती हूँ एक विशाल सागर!
लाल आँखें
पीले पड़ गए गाल
रात और दिन आँसुओं से -

क्या दे रहे हैं संकेत कि
दुनिया का सारा पानी
सकल बारिश आकाश की
है सबके विरुद्ध जिस लिए इंसान अक्सर रोता है और रोता जाता है?

 

Gråten

Mina tårar
släcker ingen eld,
och min eld
torkar inga tårar.

Aldrig sinar mina tårar,
de rinna,
för rinna,
bäckar, floder och hav,
och ändå blir
ingenting bättre.
Än kan jag gråta ihop en stor ocean!
Röda ögon
bleka kinder
av tårar i nätter och dar -

Vad förslår
allt världens vatten
allt himlens regn
mot allt vad man gråter och gråter?

-Elsa Grave

4 comments:

  1. एक बार फिर से अच्छी कविता. धन्यवाद अनुपमा जी!!

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  2. behtreen kvita anuwaad kar pesh karne ke liye aabhaar.

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  3. behtreen kvitaa kaa saral saras anuwaad prastut karne ke liye aabhaar

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